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क्या वर्तमान सरकार किसानों के हित की बात कर रही है ?

Posted On: 17 Mar, 2015 Others में

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पिछले दिनों तक़रीबन सभी प्रदेशों में बेमौसम की बरसात हुयी ,इस अप्रत्याशित वृष्टि से देश के गरीब किसानों की लहलहाती फसल बर्बाद हो गयी . किसान जो महाजन से कर्ज लेकर अपने खेतों में बीज और खाद डालता है और जब वही फसल प्राकृतिक आपदा के कहर से बर्बाद हो जाता है तो किसान के पास आत्महत्या करने के आलावा और कुछ सूझता भी नहीं और यही कारण है की बीते कई सालों में देश के बिभिन्न भागों में किसानों ने आत्महत्या जैसा गंभीर कदम उठाया, ऐसे किसानों की संख्या हजारों में है . कहने को हमारे नेता कहते रहते हैं की वे किसान के हित में काम करते हैं पर जमीनी हकीकत यही है की आजादी के 67 सालों बाद भी इस देश का किसान खुश – हाल होने के बजाये या तो आत्महत्या कर लेता है या किसानियत छोड़कर शहर की तरफ पलायन करता है . क्यूंकि शहर में उसको ऐसी किसी प्राकृतिक बिपदा का सामना नहीं करना पड़ता . इस देश का मिहनतकश किसान जिसको अन्नदाता की संज्ञा दी गयी है वह अपनी जान की रक्षा भी नहीं कर पाता महाजन के कर्जे को ना चुकाने की स्थिति में अपनी जान से ही हाथ धो देता है . क्या ? यह अपने देश की सरकार के लिए कोई चिंता का विषय नहीं है कल लोकसभा में बिहार के सांसद श्री हुकुमदेव नारायण यादव चिल्ला चिल्ला कर किसानों की तकलीफ को बयां कर रहे थे अच्छा है कम से कम किसानों की चर्चा तो हो रही है लोकसभा में . लेकिन सही मायनों में सरकार किसान हितैषी तब दिखेगी जब आपदा आने के फ़ौरन बाद मौके पर उस क्षेत्र के विधायक या सांसद किसानों के बीच जायेंगे और उनको आश्वाशन देंगे की चिंता की कोई बात नहीं उनके द्वारा लिया गया महाजन का कर्ज सरकार भरेगी लेकिन अफ़सोस .सरकार या नेता तब वहां पहुचती है जब सैकड़ों किसान आत्महत्या कर चुके होते हैं ऐसे वायदों और मदद का क्या मतलब . सरकारें आयीं और चली गयीं .पर गावं में जो कल तक किसान था वह खेतिहर मजदूर बन गया और जो खेतिहर मजदूर था वह शहर जाकर मजदूरी करने लगा या रिक्शा चलाने लगा . कम से कम उसको शाम को भोजन की गारंटी तो हो गयी किसानियत क्या है, है सब भगवन भरोसे और अपने देश की अधिकतम खेती बरसात के भरोसे है अगर बारिश ना हुयी तो खेत सूख गए , बोई गयी फसल मारी गयी आजादी के इतने वर्षों बाद भी सरकार खेतों को सिंचाई का पानी भी ना दे पायी. इस देश की कितनी ही सिंचाई परियोजनाएं बंद पडी हैं देश की बजट में उन बंद पड़ी योजनाओं के लिए क्या कुछ किया जा रहा है आज हर गाओं के हर घर में शौचालय बनाने की बात बड़ी जोर शोर से चल रही है .क्या केवल शौचालय बनवा देने से खुले में शौच की समस्या समाप्त हो जाएगी कभी यह सोंचा गया है की उन शौचालयों के लिए पानी कहाँ से आएगा . इस देश के कई गाओं में पीने के पानी का संकट है ऐसे में शौचालय जिसको साफ़ रखने के लिए शौचालय के हर एक इस्तेमाल के बाद 10 लीटर पानी की जरूरत होती है अगर परिवार में ५-७ लोग हैं तो ७०-१०० लीटर पानी तो शौचालय साफ़ रखने के लिए एक परिवार को चाहिए अतः हर घर में शौचालय के बजाये सार्वजानिक शौचालयों का निर्माण किया जाए और उसको साफ़-सुथरा रखने की जिम्मेवारी उसको इस्तेमाल करने वालों की होनी चाहिए लेकिन अफ़सोस गाओं में साफ़ सफाई के प्रति अभी जितनी जागरूकता चाहिए उतनी नहीं है पहले गाओं वालों को इतना समझदार भी बनाना होगा की साफ़ सुथरा रहना उनके स्वास्थ्य के लिए कितना जरुरी है फिर ही शौचालयों का निर्माण करने की सोचना चाहिए . अभी भी गाओं में बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है तभी गाओं के लोग शहर की तरफ पलायन करते जा रहें हैं . सरकार को ऐसा सर्वेक्षण भी करना चाहिए की देश में जितने प्रशासनिक अधिकारी या पुलिस अधिकारी चुने गए उनमें से कितने गावं में रहकर पढ़ाई किये थे इसीसे गावं की शिक्षा का स्तर पता चल जायेगा . गावं में रहने वाले को पता है की अगर वह और उसका परिवार गावं में रहेगा तो वह प्रगति नहीं कर पायेगा उसके बच्चे प्रतियोगिता परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो पाएंगे तो जाहिर है वह गावं छोड़ने की सोचेगा. आज देश के सामने सबसे बड़ी समस्या भी यही है की शहर में भीड़ बढ़ती जा रही है और गाओं खली होते जा रहे हैं अतः आज यह बहुत जरुरी हो गया है की रोजगारों का सृजन गावं में भी हो, गावं में भी शहर के तर्ज पर अच्छे स्कुल खुलें ताकि गावं में रहने वाला किसान भी अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के बारे में अस्वस्थ हो , आखिर जीवन में तरक्की हो ऐसा कौन नहीं चाहता अगर ऐसा होगा तो कोई परिवार अपन गावं छोड़ने को मजबूर भी ना होगा . अगर ऐसा कुछ नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में शहरों में भीड़ इतनी बढ़ जाएगी की शहरों में रहना मुश्किल क्या नामुमकिन लगने लगेगा और ऐसा दौर बहुत जल्द आएगा . अतः सरकार फौरी तौर पर किसानों को हुए नुकसान की भरपाई का समय रहते इन्तेजाम करना चाहिए इससे पहले की देर हो जाये और परिणामस्वरूप देश का अन्नदाता जो है उसे हैं मौत को गले न लगाना पड़े नीतियां ऐसी जरूर बननी चाहिए और लोकसभा में इसपर ही सर्वसम्मति से विचार कर किसानों की हित के लिए कुछ करना चाहिए.

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Dr S Shankar Singh के द्वारा
March 24, 2015

प्रिय श्री दुबे ji, सादर नमस्कार. आपने अक्षरश : सही लिखा hai. कोई भी राजनीतिक दल किसानों की समस्याओं की और ध्यान नहीं देता hai. जो किसान देशवासियों का पेट भरटा है वही आज आत्म हत्या करने को विवश hai. चारों और निराशा का वातावरण व्याप्त हो रहा hai. केजरीवाल से जो उम्मीदें थीं उसमें भी निराशा ही नज़र आ रही hai. सारे के सारे पुराने और नए नेता सत्ता लोलुप की नज़र आ रहे hain. पार्क के सभी दोस्त सकुशल hain. आपकी अनुपस्थिति खटकती hai. मेरी पुस्तक मई के अंत तक प्रकाशित हो sakegi. i.

    ashokkumardubey के द्वारा
    April 3, 2015

    dakatar sahab aapne mere lekh ko sahi kaha iske liye dhanyvad . main aapki pustak ke prakshit hone ka intejar karunga

Rajesh Dubey के द्वारा
March 19, 2015

कृषि की दुर्दशा दर्शाती है कि चाहे किसी की भी सरकार हो किसान को उचित हक़ नहीं मिला है. कृषि मजदूर आज के दिन में ओद्यौगिक मजदूर में बदल रहे है. जरुरत जोरदार पहल की है.

    ashokkumardubey के द्वारा
    March 19, 2015

    ekmatr vichar sahmati aajkal coment bhi nahi milte


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