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संसद से धर्म संसद की ओर

Posted On: 11 Feb, 2013 Others में

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आजकल २०१४ में होनेवाले लोकसभा चुनाव की चर्चा राजनितिक खेमे एवं राजनितिक गलियारोंमें बड़ी जोरों पर है और अपने देश की दोनों राष्ट्रिय पार्टियाँ इस देश में होने वाली किसी भी घटना को राजनितिक नजरिये से हीं भुनाती नजर आ रहीं हैं, उनके जेहन में जनता का आज क्या हाल है? यह जानने का प्रयास किसी पार्टी नेता का नहीं , और ये नेता ये पार्टियाँ २०१४ के चुनाव आते आते जनता को कितना सतायेंगे उनपर कितना अत्याचार करेंगे यह तो आने वाला वक्त बताएगा चुनाव में जीत हार तो नेताओं की होगी पर जनता जो यहाँ असहाय और बेसहारा बनती जा रही है उनसे किसी नेता या पार्टी का कोई सरोकार नहीं आज हर घोसना केवल और केवल चुनाव में कितना फायदा होगा केवल इसके लिए ही सारी घोस्नाएंकी जाती हैं एवं योजनाओं की तय्यारी भी इसके लिए हीं चल रही है
और एक तरफ अलाहाबाद में धर्म संसद इकठी हुयी है और नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की घोषणा हो रही है और उसमें भी अन्तर्विरोध हो रहा है क्यूंकि आज अलाहाबाद में विश्व हिन्दू परिषद् ,राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ और कई अखाड़े वाले महंत साधू संत सभी इकठ्ठे हुए हैं और यह धर्म संसद न होकर राजनितिक मंच बन गया है और हमारे देश की सत्ता में काबिज कांग्रेस पार्टी के नेता एवं उनको समर्थन देने वाले सभी पार्टियाँ इस मुद्दे पर एकजुट होते दिखाई देते हैं की नरेन्द्र मोदी एक सांप्रदायिक छबि के नेता हैं और उनकी पार्टी भी सेकुलर पार्टी नहीं मुस्लिम विरोधी है ऐसा कांग्रेस एवं देश की अन्य पार्टियों का मानना है और बीजेपी भी एक कदम आगे बढ़कर कुछ ऐसे बयान जारी करते रहते हैं हलाकि अपने देश में सेकुलर की परिभाषा ही बड़ी विचित्र है और संविधान द्वारा घोषित नहीं है नेताओं ने अपनी सुविधा अनुसार बीजेपी को कैसे सांप्रदायिक कहा जाये? इसका मौका धुन्धती रहती है और उनके बयानों को तोड़ मरोड़कर ऐसा साबित करने की कोशिस करती है की बी जे पी सांप्रदायिक पार्टी है कांग्रेस ने आज तक मुस्लिमों का क्या फायदा किया कितनो को अपनी पार्टी में टिकट दिया इसकी चर्चा कभी नहीं करती पर बीजेपी को साम्प्रदयिक जरुर कहती है जबकि नरेन्द्र मोदी ने गुजरात चुनाव में मुस्लिमों का वोट भी हासिल किये हैं और उनको मुस्लिमों ने वोट भी दिया है जबकि कांग्रेस उनके खिलाफ कुप्रचार करती रही हुवा कुछ भी नहीं .लेकिन इन सब परिस्थितियों में एक बात समझ से परे है की आज बहुसंख्यक हिन्दू किसके साथ है किसको सेकुलर समझकर अपना वोट देता है क्या इस देश के सारे हिन्दू सांप्रदायिक हैं? और मुस्लिम धर्म निरापेक्छ हैं इसका खुलासा भी कांग्रेस को करना चाहिए संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु को फांसी देने में इनको इतने साल क्यूँ लगे ? जबकि सुप्रीम कोर्ट ने २००६ में फांसी की सजा सुना चुकी थी इसका जवाब ये कांग्रेसी क्यूँ नहीं देती और १९८४ में सिख दंगे किसने करवाए इसका जवाब क्यूँ नहीं देती उसमे दोषी पाए गए लोगों को आज तक सजा क्यूँ नहीं हुयी? आज इसकी चर्चा कोई पार्टी नेता क्यूँ नहीं करता? सिख तो मुस्लिम नहीं उनपर ऐसा जुल्म क्यों हुवा? केवल मुस्लिम पर होने वाले जुर्म का ख्याल इनको आता है मैं कहता हूँ प्रजातंत्र में किसी संप्रदाय या समुदाय पर जुर्म करने वाला सजा का हक़दार है इसमें राजनीती नहीं होनी चाहिए ये नेता समाज को जाती संप्रदाय एवं धर्म के नाम पर बाँट रहे है इसकी चर्चा होनी चाहिए और जब १२२ करोड़ की आबादी में ५५ करोड़ हिन्दू मतदाता हैं और उसमें से केवल ८ करोड़ वोट देते हैं ऐसा क्यों है ? क्या इतने मतदाताओं के बल पर ये नेता अपने को चुन हुवा जन प्रतिनिधि कह सकते हैं हाँ! मुस्लिम जरुर भारी संख्या में मत देते हैं और यही कारन है की जिस पार्टी को मुस्लिम वोट देते हैं वाही पार्टी आज हिंदुस्तान में विजयी होती है और यही कारन है की सभी पार्टियाँ (बीजेपी) को छोड़कर सभी पार्टियाँ मुस्लिम तुष्टिकरण में लगी रहती है कोई उनको आरक्षण का लालच देता है कोई उनको हज में जाने के लिए फ्री पास का इन्तेजाम करता है और न जाने क्या क्या करता है और बहुसंख्यक हिन्दू आज उपेक्षित नजर आता है
इस समय विश्व भर से अलाहाबाद के संगम पर कुम्भ नहाने जो श्रद्धालु आये हैं वे बदिन्तेजामी के भेंट चढ़ जाते हैं और भेड़ बकरियों की तरह कुचलकर मारे जाते हैं न कोई पार्टी सामने आ रही है न कोई सांसद न कोई पुलिस न कोई रेल अधिकारी बल्कि सबसे पहले टेलीविजन वाले वहां पहुचते हैं पुलिस तो भीड़ को तितर बितर करने के लिए लाठी चार्ज करती नजर आई है और लाशें बिछी पड़ी रहीं घंटों कोई उनकी सुध लेनेवाला नहीं था ऐसा टेलीविजन पर देखने को मिला सारे देश ने देखा लोग अपनों से बिछड़ कर कैसे रोते बिलखते नजर आये वहां धर्म ससद भी है, विश्व हिन्दू परिषद् भी है आर एस एस भी है कहाँ गए वे लोग जो इन मरने वाले हिन्दुओं की सहायता को आगे नहीं आये मानवता के नाते तो यही करना चाहिए अगर ऐसा कुछ करते तो जो भीड़ इतनी वहां इकठ्ठी हुयी है जरुर उनकी मदद को जो पार्टी आती उनको वोट देने की सोंचते तो ऐसे मौकों पर तो ये नेता एक दुसरे पर दोषारोपण कर रहें हैं किसी सहायता के काम के लिए ये तो आगे आते नहीं इससे क्या पता चलता है? क्या सन्देश जनता के बीच जाता है ? ये कितने जनहित वाले नेता हैं और ये पूरे साल चुनाव की बातें करते रहते हैं कोई इनको क्यों चुने? ये इतने बेरहम हैं क्या ये जनता का दुःख दर्द कभी समझेंगे? अपने देश में आपदा प्रबंधन के लिए अलग विभाग भी बना है वाही आ जाते इस आपदा के समय कोई है पूछने ,आज जवाबदेही किसी की नहीं और इनको वोट चाहिए और चुनकर आकर राज करने की लालसा है जनता ही मुरख है जो इनकी सारी ज्यादतियों को भूल जाती है और फिर से उनके लिए समय सामान्य हो जाता है अपनी दाल- रोटी में जुट जाते हैं. ऐसे में , मेरा यही कहना है – सांसद हो या धर्म सांसद किसी को यह तो विचार करा चाहिए की , जनता का भला कैसे होगा, कैसे लोग बढती महंगाई से निज़ात पाएंगे ,कैसे भ्रष्टाचार रुपी दानव पकड़ा जायेगा कैसे दोषिओं एवं अपराधियों को जल्द सजा मिलेगी कैसे दुराचारियों का अंत होगा इस पर भी तो चर्चा होनी चाहिए इन सांसदों में और कैसे अपने यहाँ वोट का प्रतिशत बढे ताकि ज्यादा से जायदा लोग इस मतदान पर्व में हिस्सा लेकर अपना नेता चुने जो उनकी सुध ले केवल अपनी जेब न भरता रहे और सचमुच का लोकतंत्र अपने देश में स्थापित हो कानून का राज हो अपराध मुक्त समाज हो चरित्रवान युवा एवं युवती बने इमानदार कर्मचारी और अधिकारी बने पुलिस की छबि सुधरे पुलिस कानून में सुधर जल्द हो जो वर्षों से लंबित है और लालच से दूर रहें और देश में खुशहाली लाने का प्रयास नेता एवं आम जनता करें इसीकी उम्मीद के साथ !

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
February 14, 2013

सहमति आपके विचारपूर्ण आलेख से दुबे जी.

    ashokkumardubey के द्वारा
    February 14, 2013

    aapki sahmati ke liye aabhar! nishaji

Rajesh Dubey के द्वारा
February 13, 2013

आस्थावान लोग कुम्भ में धर्म की भावना से जाते हैं, न कि राजनीति करने. धर्म संसद प्रायोजित कार्यक्रम था. इससे आम लोगों का और साधुसंतों का कुछ लेना देना नहीं था.


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